एक थी माया

विजय कुमार सपत्ती

एक थी माया
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सारांश

मैं सर झुका कर उस वक़्त  बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, "अभय, खाना खा लो" ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ," माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।" दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था ।  गरीबी का वो ऐसा दौर था कि  बस कुछ पूछो मत ।  जो मेरे पढने का वक़्त था , उसमे मैं उस मेडिकल शॉप में सेल्समेन  का काम करता था ।    
Gautam chand
bahut hi dillagi hai..
Gaurav Kumar
बहुत बढिया
आदित्य शर्मा
heart touching aisa lag kise yeah khani meri ho mai hi abhay hun well done sir
Raj Kawli
बहुत ही खुबसूरत मार्मिक रचना ।
Amit Gupta
दिल को छूती, मन को भिगोती अत्यंत कारुणिक प्रेम कहानी
urvashi
very nice post dil ko chhu gyi
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