एक थी माया

विजय कुमार सपत्ती

एक थी माया
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सारांश

मैं सर झुका कर उस वक़्त  बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, "अभय, खाना खा लो" ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ," माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।" दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था ।  गरीबी का वो ऐसा दौर था कि  बस कुछ पूछो मत ।  जो मेरे पढने का वक़्त था , उसमे मैं उस मेडिकल शॉप में सेल्समेन  का काम करता था ।    
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