एक अलौकिक प्रेमकथा - सती से पार्वती तक

विजय कुमार सपत्ती

एक अलौकिक प्रेमकथा - सती से पार्वती तक
(34)
पाठक संख्या − 8952
पढ़िए

सारांश

ॐ नमः शिवाय   ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनानत् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥   हम त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर की पूजा करते हैं जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन पोषण अपनी शक्ति से कर रहे है, उनसे हमारी प्रार्थना है कि जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल रुपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है , उसी प्रकार हम भी इस संसाररुपी बेल मेंपक जाने के उपरांत  जन्म मृत्यो के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाए और आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में  लीं हो जाए और मोक्ष को प्राप्त कर ले !   ‘कर-चरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा 
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम, 
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व, 
जय-जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥’   अर्थात - हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मन से भी हमने जो अपराध किए हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको क्षमा कीजिए,  हे करुणासागर महादेव शम्भो !   आपकी जय हो, जय हो ।    तस्मै नम: परमकारणकारणाय , दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय । 
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय , ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ॥ 1 ॥ जो (शिव) कारणों के भी परम कारण हैं, ( अग्निशिखा के समान) अति दिप्यमान उज्ज्वल एवं पिङ्गल नेत्रोंवाले हैं, सर्पों के हार-कुण्डल आदि से भूषित हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि को भी वर देने वालें हैं – उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।
Rajni Gupta
Aanand mil gya, Shiv katha padkar
S Soni
हर हर महादेव भगवान शिव के लीलामय प्रेम विवाह की कथा सचमुच अलौकिक है दिव्य है।
Arvind Bhatt
आपका बहुत बहुत आभार
धर्मेंद्र विश्वकर्मा
जय हो शिव शंकर भगवान की........
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.