Tarun Upadhyay
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

कोई बंध नहीं मालूम, ना ही कोई छंद जानता हूँ। हूँ भाषा में पाये जाने वाले भावों का, ना कि भाषा का अनुगामी, मैं वो अकवि हूँ जो बस भाव जानता हूँ, और भावों के परे कोई भाषा नहीं जानता। हूँ कबीर की परंपरा का अनुयायी जिस कबीर ने जटिल साहित्यिक भाषा और रूढ़वादी परंपरओं को नदारद कर उस सरल भाषा को चुना जिसे एक आम से आम इंसान पड़ सके जिसे मैं, आप और आम से आम इंसान तक समझ सके।


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