Sanjay Mehta
प्रकाशित साहित्य
453
पाठक संख्या
20,725
पसंद संख्या
0

परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

उस दौर का वो मिर्जा ग़ालिब आज कहीं मिलता नहीं.. सुना है पानी के ना होने से कहीं गुलाब खिलता नहीं.. चाहत हो चमन की तो उसके रंग में रंगना सीख लो.. बारिश का मौसम है गर, थोड़ा थोड़ा तुम भी भीग लो.. एक एक पल मेरे हाथो से फिसलता यूं जा रहा.. ग्लेशियर था मैं कभी, नदी में मिलता हूँ जा रहा.. अगर होता संजय उसको जरा सा भी प्यार मुझसे.. उसके हावभाव से जाहिर होता ना कि इजहार से.. कुछ होकर भी कुछ नहीं, खुश होकर भी खुश नहीं.. ये इंसानी प्रवृति, ना मैं अछूता ना कोई माकूल ही.. मेरा मुझसे पूछ रहे सवाल, इसका जवाब क्या दूँ.. आईने को अक्सर अपना अक्स दिखाई नहीं देता.. जीवन ही जीवन की इकलौती परिभाषा है.. कहीं डूबने का डर तो कहीं जीने की आशा है.. आप आये मिलने और आपके चेहरे से नजर हटे.. ये असमान्य घटना है जो कभी भी ना घटे.. फिर वही रोज के बेरंगी जीवन पर सवार हूँ अभी.. उतरने दो मुझको तो पता चले बाहर का माहौल.. शाम की सजावट का असर सुबह तक रह गया.. वो शख्स 1 पल आया और दिल में ठहर गया.. दो पल की दो पल में कट रही बात.. जिंदगी का सिलसिला दो पल का नहीं.. आईने की तरह नहीं जिंदगी के रूप रंग.. पग पग पर मखोटे है, बदले बदले से ढंग.. मिट जाती है हाथ की लकीरे हथेली से.. कौन कहता है लकीरे पत्थर की होती है.. किस तालीम की जिक्र ओ आब में बहू.. कि कश्तियो के साहिल सब एक जैसे है.. तेरी बातो का मेरी बातो से तालुकात कैसे.. चाँद की ना हो दिन से एक मुलाकात जैसे..


Shilpi Saxena "Barkha"

1,138 फ़ॉलोअर्स

प्रभात पटेल "पथिक"

1,163 फ़ॉलोअर्स

Amit Bijnori

346 फ़ॉलोअर्स

n Mesurani "નિધી"

99 फ़ॉलोअर्स

kapil Tiwari benaam

679 फ़ॉलोअर्स

Seema Nagar

2 फ़ॉलोअर्स
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.