हिमांशु तिवारी आत्मीय
प्रकाशित साहित्य
4
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

स्थान:     लखनऊ

सारांश:

क्या हूं, क्या नहीं.....सच कहूं नहीं जान पाया हूं। पत्रकारिता का पेशा है....और पेशे में मैं हूं....जारी है सब कुछ....देखिए क्या बनता हूं, क्या नहीं। क्योंकि पहचान तो आखिरी वक्त होती है न...कि बहुत अच्छे इंसान थे...पता नहीं बन पाऊंगा या नहीं। बस इत्ता सा।


PRASHANT PRASAD

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विनोद कुमार दवे

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