विश्वनाथ मिश्रा
प्रकाशित साहित्य
177
पाठक संख्या
86,227
पसंद संख्या
0

परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

कुछ दैहिक क्षण भर के सुख को, अन्तिम मान रही है दुनिया, लेना-देना, खोना-पाना, बस ये जान रही है दुनियाँ। मन से जो सब बात समझते, काम नही, अनुराग समझते, बस उनसे ही पल्लवित निशदिन, अमर प्रेम की ये गाथा है। भावनाओ को शब्दो मे पिरो कर कविताओ और लेखो के मध्यम से आपके सामने रखने की छोटी सी कोशिश करता हूँ। आप दोस्तों से अनुरोध की मुझे मेरी गलतियों से अवगत कराते रहे और शुभकामनाएं दें कि मन को भावनाओ को आपके सामने सच्चाई से रख पाऊँ मुझे मेरे ब्लोग पर भी फोलो करें, http://vishvnathblog.blogspot.in,


Tanuja

73 फ़ॉलोअर्स

दुर्गा प्रसाद

360 फ़ॉलोअर्स

d b

1 फ़ॉलोअर्स

Shivam aggarwal

1 फ़ॉलोअर्स

Aapka love guru Social worker "Love guru"

75 फ़ॉलोअर्स
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.