विश्वनाथ
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

कुछ दैहिक क्षण भर के सुख को, अन्तिम मान रही है दुनिया, लेना-देना, खोना-पाना, बस ये जान रही है दुनियाँ। मन से जो सब बात समझते, काम नही, अनुराग समझते, बस उनसे ही पल्लवित निशदिन, अमर प्रेम की ये गाथा है। भावनाओ को शब्दो मे पिरो कर कविताओ और लेखो के मध्यम से आपके सामने रखने की छोटी सी कोशिश करता हूँ। आप दोस्तों से अनुरोध की मुझे मेरी गलतियों से अवगत कराते रहे और शुभकामनाएं दें कि मन को भावनाओ को आपके सामने सच्चाई से रख पाऊँ मुझे मेरे ब्लोग पर भी फोलो करें, http://vishvnathblog.blogspot.in,


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