विवेक कुमार शुक्ला
प्रकाशित साहित्य
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845

परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

मत पुछ इस पंछी से कहाँ जाना है, पंख पसार उड़ चले हैं, इस उन्मुक्त गगन में, जहां दिन ढल जाये, बस वहीं ठिकाना है। कल आज और कल की फिकर क्यों हो हमे, जब अपनी खिदमत् करता सारा जमाना है ।


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