रंजना गुप्ता
प्रकाशित साहित्य
12
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पसंद संख्या
26

परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

संघर्ष - वह भी अनवरत संघर्ष, व्यक्ति की जिजीविषा को, उसकी सोंच की दिशा को एक निश्चित आयाम दे देता है । भाग्यवश मुझे भी जीने के लिए, सदा एक कठोर रेतीली भूमि ही मिली, मगर मैंने जीवन की उस तपिश भरी शुष्कता में भी दूब के नन्हे नर्म कोने ढूंढ़ लिए । यह मेरे गीत - अगीत, कविताएँ, लेख और कहानियाँ आदि सब उसी आद्रता की एक स्निग्ध पहचान भर है । जहाँ निर्मम वर्जनाओं, बाध्यताओं में भी जीवन लगातार साँस लेता रहता है । एक व्यापक संपूर्ण सृजन की तलाश, लेकिन समय के अभाव में, मुट्ठी से रेत की तरह, साल-दर साल फिसलते रहे । ज़िन्दगी का प्रत्येक मुखौटा मुझे केवल डराता रहा । इस तरह वक़्त के थपेड़ों के साथ-साथ, बहते हुए सहज ही, स्वपीड़ा, सृष्टि की पीड़ा में रूपांतरित होती रही । मै समझती हूँ अपने अस्तित्व का एक-एक कण भी, विश्व की चीत्कार में मिला कर, यदि मैं उसका कोई उपकार कर सकती, उसकी छिन्न-भिन्न देह का कोई घाव भर सकती, तो यह जन्म सार्थक मानती ।


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