मनोज बंसल
प्रकाशित साहित्य
23
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0

परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

हिन्दी से गहरा लगाव समय के साथ और गहरा होता गया। इसी लगाव ने ''विशारद'' और "साहित्य रत्न" जैसे सम्मान सूचक शब्दों को मेरे नाम के साथ जोड़ दिया। अर्थ उपार्जन एवं खुद को स्थापित करने की कोशिश में लेखन के कुछ वर्ष व्यर्थ हो गये मगर साहित्य सदैव आत्मा में परमात्मा की तरह उपस्थित रहा। मेरे मित्र 'राजकुमार जैन' ने मुझे "प्रतिलिपि" से रूबरू करवाया और यह मुलाकात अब एक नये सफर की न रूकने वाली शुरुआत हो इसी उम्मीद के साथ................ मनोज बंसल


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