प्रीति
प्रकाशित साहित्य
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

एक छोटा सा प्रयास "अधूरी कहानी" कुछ कहानिया शायद अधूरी बनने के लिए ही होती है ? इनमे से एक कहानी है एक 4.2 फ़ीट पर बिंदास ,मस्तमौला,अपने शर्तो पर जीने वाली ओर घर मे सबकी प्यारी अनामिका ,नाम तो कुछ था उसका पर भविष्य उसे पहले ही इस नाम की उपाधि दे चुका था!  अनामिका निडर हौसलो से भरपूर ओर नई नई आशाओ के साथ सभी को जोड़ने वाली लड़की थी! अनामिका का बचपन खुशियो के झूले मैं झुलते झूलते न जाने उसे कब बड़ा बना दिया , अलहड़ता,बेबाकपन ओर मस्त मोला शब्द तो समय ने जैसे उससे चुरा ही लिए थे उसका सारा बचपन कब जिम्मेदारियो के पंख ले कर उड़ गया था! अब अनामिका एक प्रौढ़ या परिपक्व औरत का रूप ले चुकी थी ओर वो भी बिन ब्याही समय के हाथों मजबूर अनामिका ने अपनी एक छोटी सी अलग दुनिया बना ली और घर समेटने मैं लगी रही पर उसका समेटने का तरीका शायद कुछ अलग या यूं कहें कि गलत थी ! पापा की लाडली भाइयो की प्यारी अनामिका से पिता का साया उठ गया ,उस समय सब के होने के बाद भी वो लडखडाती ,गिरती  ,उठती अनामिका एक बार फिर खड़ी हुई अपनो के लिए ! इस बीच अनामिका के छोटे से दिल मे किसी ने दस्तक दी, अनामिका भली भांति जानती थी कि ये दस्तक बस कुछ पल की ही खुशी है पर दिल ही दिल मे वो किसी को अपना मान चुकी थी बिना किसी अपेक्षा के वो उस अजनबी की शायद सबसे करीबी दोस्त ही रहीं ओर अनामिका को इससे ज्यादा कुछ चाइये भी नही था ,  उस एक तरफा प्यार के लिए चिंता ,उसकी भलाई उसकी जिंदगी को  सजना चाहती थी उसकी खुशी मैं अनामिका खुश थी और उस एक तरफा प्यार को वो अपनी खवाबों की दुनिया बना कर खुश थी क्यों कि उसे पता था कि ये सपना भोर की बेला का नही रात के दूसरे पहर का सपना था जो कि कभी पूरा नही हो सकता! इन सब बातों के बाद भी जमाने को  दिखाने के लिए आज भी अनामिका बुलंद दरवाजे की तरह अपने मन को ताला लगा रखा था जिसमे न तो कोई झाँक सकता था और न ही उसकी मर्जी  के बिना कोई आ सकता था! अपने आप को मजबूत बताने वाली अनामिका अंदर से खोकली हो चुकी थी और उलझनों के जालो  मैं फस कर राह गयी थी या यह भी कह सक्तये है कि वो बाहर निकलना ही नही चाहती थी ! पर शायद किसी ने सही कहा है कि वक़्त के आगये किसी का भी जोर नही चला है  वक्त की करवट के साथ अनामिका के 8 से 9 साल पुराने प्यार ने फिर दिल का दरवाजा खतखटया ओर नादान अनामीका जिसके दिल मे  झांकने की किसी को इज़ाजत नही थी अपने ही बनाये मायाजाल मैं फस कर  अपने पहले प्यार के सामने अपने दिल की चाबी दे दी ! पर अनामिका शायद भूल चुकी थी कि जंग लगे ताले कभी किसी के काम नही आते ओर फिर एक बार जंग लगी चाबी  ओर बंद हुए ताले के साथ वह आज भी अकेली थी! कहते है ना भगवान सोना बनाने के लिए इंसान को आग के  सामने खड़ा कर दिया , अपने बच्चे न होने पर भी भाइयो के बच्चो पर उसने अपना सारा वात्सल्य उतार दिया ,पर कहते है ना कि खुशियों से  अनामिका का दूर का रिश्ता भी नही रहा, जिनके लिए उसने अपनी जिंदगी को बना कर रखा वो ही लोग  अनामिका से नफरत करने लगे! फिर एक उम्र का पड़ाव उस पर अकेलापन उसे अवसाद की ओर धकेलने लगा था बीच मैं दोस्तो ने सहारा दिया हाथ थामने   के लिए आगये भी आये पर अनामिका को अब खुशियो से जैसे कोई डर लगने लगा था! एक बार प्यार फिर लौट पर अनामिका उसे फिर भी न पा सकी। अब अनामिका के जीवन को कोई उद्देश्य ही नही रहा अपना सब कुछ परिवार के लिए समर्पित करने पर भी भगवान और जाने क्या चाहता था कि एक शाम अनामिका फिर अनाथ हो गयी उसकी माँ का साया भी उसके सर से उठ चुका था। अवसाद के दलदल मैं फसी अनामिका अपने आप को फिर से खड़ा करना  चाहतीं है और  भगवान से एक प्राथना ले कर की ये अधूरी कहानी एक न एक दिन जरूर पूरी होगी । एक छोटा सा प्रयास था शायद आप को पसंद आये


DrLalitSinghR

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मुकुल सिंह

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रिफ़अत शाहीन

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