प्रणिता .माया आनंद टेम्भुर्णे
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

"आँखों को जो बात जँच गई ,रूह में अगर वो बस गई,अल्फाज़ो में देकर उसका एक रूप,हमारी किताब जैसे सज गई..मुझे बहोत अच्छे से शब्दों को सजाना नहीं आता .पर फिर भी कभी खुद के ,कभी लोगो के अहसासों को एक रूप देने की कोशिश कर रही हूँ..अगर कही कुछ सुधारने की जरुरत ह तो जरूर बताए...धन्यवाद "आप सबके प्यार के साथ एक छोटी सी कोशिश...


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