कुलदीप कन्नौजिया
प्रकाशित साहित्य
20
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

अपने बारे में ज़्यादा तो नहीं जानता पर इतना तजुर्बा है कि मैंने हमेशा उनको गलत साबित किया है, जो मुझे गलत समझ बैठते हैं! मैं कोई लेखक नहीं बस अपने मन में चलती हलचल को कुछ शब्द दे देता हूँ। अभी-अभी लिखना शुरू किया है। एक लंबा सफर तय करना है। अपनी कमियाँ सुधारनी है, और वक़्त दर वक़्त बेहतर होते चले जाना है। और आखिर में बस इतना ही कहना चाहूँगा कि, खुदको दरिया तुम्हें दरिया की रवानी लिख दूँ। आओ गुज़री हुई मौज वो पुरानी लिख दूँ। तुम जो मिल जाओ तो मिल जाये ज़माना मुझको, लम्हे-लम्हे पर नई एक कहानी लिख दूँ।।।


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