कुलदीप कन्नौजिया
प्रकाशित साहित्य
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

अपने बारे में ज़्यादा तो नहीं जानता पर इतना तजुर्बा है कि मैंने हमेशा उनको गलत साबित किया है, जो मुझे गलत समझ बैठते हैं! मैं कोई लेखक नहीं बस अपने मन में चलती हलचल को कुछ शब्द दे देता हूँ। अभी-अभी लिखना शुरू किया है। एक लंबा सफर तय करना है। अपनी कमियाँ सुधारनी है, और वक़्त दर वक़्त बेहतर होते चले जाना है। कभी तिनके, कभी पत्ते, कभी 'खुशबू' उड़ा लायी, हमारे पास तो आँधी भी कभी तन्हा नहीं आयी। खाली नहीं रहा कभी आँखों का ये मकान, सब अश्क़ निकल गए तो उदासी ठहर गई।


Ranu Bindoriya "Raavi"

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