ऋषभ आदर्श
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परिचय  

प्रतिलिपि के साथ:    

सारांश:

आधी रौशनी में कुछ अक्षर अधूरे नज़र आये; आईने में से झांकती शक़्ल में हम अनजाने नज़र आये... गले में चुभती सी प्यास...कुछ और चुभती है! कोई भूख भी है जो, दानों की मार से भी न मरती है! मेरी हथेलियों पर स्याही के निशान बेजा लगने लगे हैं... हम तस्वीरों में भी अधूरे लगने लगे हैं!! क्या फायदा है मेरे कहने या न कहने का?? ये शाम तो वैसे भी ढल जायेगी! यूँ तो शीत ही मिज़ाज़ है मौसम का...पर सहरा प्यास ही लाएगी!! कागजों पर पड़ती रौशनी हम ज़रा और सुलगा लेते हैं! अक्षरों का आधा और पढ़ लेते हैं... फिर शायद चुभन कम हो...मेरी कही अनकही न हो... शाम ढले तो ढले पर उसके बाद वाकई सहर हो!


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