फ़रिश्ता,,,,

नृपेन्द्र शर्मा

फ़रिश्ता,,,,
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सारांश

आज रमेश का कॉलेज में आखिरी दिन था। लेकिन उसने गांव न जाकर यहीं शहर में ही कोई नोकरी करने का फैसला किया था। उसने एक दफ्तर में नोकरी की बात भी कर ली थी। कल से ही तो उसे नोकरी पर जाना है, अभी वो गांव ...
Suresh Tomar
रुढ़िवादी समाज पर तमाचा है पृस्तुति सराहनीय है।
ब्रजेंद्रनाथ मिश्रा
अच्छी कहानी। प्लाट बगत सुंदर है,कहानी को आपने अच्छी तरह आगे बढ़ाया है। अंत आते-आते एक सामाजिक संदेश देकर लेखक के उत्तरदायित्व को भी पूरा किया है। आप इसी साइट पर मेरी रचनाएँ भी पढें और अपने विचार ढें। आपके सिचार मेरे लिए बगुमूल्य है। सादर! ब्रजेंद्रनाथ
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डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
बहुत बढ़िया। भावपूर्ण सृजन।
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Rashmi Arora
bahot hi shaandaar story hai aapki Nripendra ji
Sandy Dalal
nice story👌👌👌
Akanksha Pandey
wauuu very nice story...but kya schi story h
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