ग़ज़ल

शरद तैलँग

ग़ज़ल
(56)
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सारांश

ग़ज़ल पत्थरों का ये बड़ा अहसान है हर क़दम पर अब यहाँ भगवान है। वो बुझा पाई न जलते दीप को ये हवा का भी बड़ा अपमान है। देखता ही शब्द बेचारा रहा अर्थ को मिलता रहा सम्मान है। फिर खिलौनों की दुकानें सज ...
मल्हार
उम्दा 👌👌👌
Smritee tripathi
बहुत अच्छी ग़ज़ल है ।
Sk kumar
aapke liye hr tareef km hau
अनिल कुमार
बहुत खूबसूरत लिखा आपने । 👌👌👌
नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष
वाह सभी गजलें बहुत अच्छी
pragya vyas
बेहद खूब👌।
Steven Stanley
बहुत खूब ।कुछ तो दिल की गहराई तक पहुँची ।
शिवांगी भारतीय
शब्दों को बहुत अच्छे से सजाया है
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