हाथी की फाँसी

गणेश शंकर विद्यार्थी

हाथी की फाँसी
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सारांश

कुछ दिन से नवाब साहब के मुसाहिबों को कुछ हाथ मारने का नया अवसर नही मिला था। नवाब साहब थे पुराने ढंग के रईस। राज्‍य तो बाप-दादे खो चुके थे, अच्‍छा वसीका मिलता था। उनकी ‘इशरत मंजिल’ कोठी अब भी किसी ...
Lavkush Mishra
वाह भाई .....!! क्या बात है, मजा आ गया। बेहतरीन रचना।
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