हरिया_बा_‬

धीरज झा

हरिया_बा_‬
(89)
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सारांश

" का हो बाबा ! कहिया भोज खिला रहे हैं | " " कौना बात के भोज बबुआ ?" " आपन सराध के |" " अपन बाबू के सराध करो जा के | कुकुर कहीं के | ससुर के नाती | " बाबा की गालियां जितना स्पीड पकड़तीं ठहाकों की गूंज ...
Rakesh Anand
दिल को छू लेने वाली रचना। साधुवाद।
Vijay Singh
अप्रतिम प्रेम की अनूठी कहानी !👌
Varinder Kaur
sach m majburi m he bal majduri karty hy
कुणाल ठाकुर
धीरज जी आपकी इस कथा ने आज गांव याद करा दिया। शुभकामनाएं। ऐसे ही लिखते रहिये
shailbalakejriwal shailbalakejriwal
Ha..50 ke dashak tak is tarh ke log ...jo kah diya kr dikhaya hua krte the.... meri kolony ke pas ek pratishthit parivar me aise hi ek purush ne kisi bat pr naraj hokr kasm kha li..ab ghar me pair nahi rakhunga...marte mr gaye ...bahr baramde me pade rahe...ghr ki chukht na langhi...😊
Raghavendra Singh
bihari mitti ki sugandh kahani se aa rahi hai bhaijaan. bahut sundar laga jaise apno ke neech ki baatein likkha gaya ho
Ashish Sajwan
सच्चा प्यार अमर है.. बहुत मार्मिक कहानी है... समाज मे दहेज के लोभी लोगों के मुहँ पर करारा तमाचा है यह कथा.
himanshu
bahut hi marmik katha
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