हमारी मृगतृष्‍णा

पंडित बाल कृष्ण भट्ट

हमारी मृगतृष्‍णा
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सारांश

अनंत असीम मरुस्थली में भटक कर गया हुआ बटोही जैसा दूर से चमकती मरु-मरीचिका देख जलाशय के भ्रम से दौड़ता हुआ व्‍याकुल हो गिर पड़ता है। वैसा ही हम दु:ख, दारिद्रय, प्रपीड़ित हो आशा मरीचिका के पीछे दौड़ ...
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