हनियां

विवेक मिश्र

हनियां
(136)
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सारांश

बुंदेलखंड के बीहड़ों में भटकती ज़िंदगी की सच्ची कहानी...
Poonam Kaparwan
श्रीमान जी रुहाँ काँप गई मेरी विश्वजीत कितना निरदयी नीच भोगी विलासी इन्सान था !बलात्कार की हर सीमा तोड दी। हर औरत के शरीर का भोगी औरत सूखा की गन्दी चाहत ।ईश्वर ने औलाद नहीं बख्शीश मे दी ।पत्नी भी  धृणा करती थी ।थाने मे हनिया से बल पूर्वक नारी का बलात्कार साथ और सिपाहियों ने भी  रौदा ।औरत थी ।बेचारी ।जलती चिता मे भी  अभय के साथ जला दिया जब वो गर्भवती थी। तीन लोगों के बल की निशानी कितना दर्द झेला हनिया ने ।रे राम ।अंत सही पुरुषत्व होने का ।हनिया की बहन ने सहवास कर उसका अंग काट दिया सही किया और अंत मे गीता का श्लोक पाप का घडा भर गया था ।विश्वजीत का ।फूलन देवी जी का चित्रण भी  लगा ।वो भी  अनेक कष्टों को और बलात्कार की पीडा सहकर डकैत बनी ।मैं पहली बार प्रतिलिपि पर ऐसा दर्दनाक नारी उत्पीड़न की कहानी पढ रही हूँ ।नशा राजनौतिक कारण भी  दिखाए ।लाजवाब लेखन ।
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poet:- rameenand chaurasia
बहुत सुन्दर रचना हमारे रचना पर भी प्रतिक्रिया दे
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ashwini jaiswal
अत्यंत सम्वेदनशील और सच्ची
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Shikha Bhardwaz
बेहतरीन
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शशांक भारतीय
आपके लेखन के प्रेम में हूँ सर....
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Satyendra Yadav
कहानी पाठक को बुंदेलखंड के बीहड़ों में ले जाने में सफल रही,ओर यही लेखक की सफलता है कि बो इस कथानक को पाठक के सामने दृश्य रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे।
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Swati Dwivedi
behtareen 👌👌👌
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Jagruti J9
Behtarin... 👍👍👍
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Vijay Hiralal
Accha likha aapne
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RattanLal Tanwar
bahut achhi aur police k burbur mansikta ki dastan h aur apne pariwar ko burbad krne wale se bhanno ka badla kabile tariff h
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