सोच पर अफ़सोस

मृण्मयी डोईजोडे

सोच पर अफ़सोस
(14)
पाठक संख्या − 246
पढ़िए

सारांश

सोचा तो, इस तरह बदनाम नहीं होते। यू हि सरेआम चर्चे नहीं होते। गुमनामिका साया हमेशा उनकाही पिछा करता हैं,जो हर एक को अपनाना चाहते है। यादोंकी की इमारत कभी पूरी नही होती। यादें कभी खत्म नही होते। ग़जल ...
आँसुओंने कब किसकी इजाजत माँगी हैं... वे तो बिनकहें ही बहते हैं। 👌👌
रिप्लाय
Sudhir Kumar Sharma
अद्भुत
रिप्लाय
अनामिक वानखेडे
खूप छान....👌👌👌
रिप्लाय
सतीश पोकळे
वाह जी 👌... खूबसुरत शब्दांकित
रिप्लाय
संजय रोंघे
मस्त
रिप्लाय
Vikrant Madhale
Wow
रिप्लाय
कवी विजय पराते
👌👌👌👌👌
रिप्लाय
ऋषिकेश
गुमनाम है कोई। बदनाम है कोई। किस को खबर, कौन है वो। अनजान है कोई।
रिप्लाय
विनोद डंबे
खुप छान लिहितां ,लिहीतं रहा...अप्रतिम
रिप्लाय
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.