सुगन्धा

राजेश रस्तोगी

सुगन्धा
(152)
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सारांश

पन्द्रह पैसे के पोस्टकार्ड की खूंटीपर अपनी असमर्था को लटका कर भैया सभी दायित्व से कन्धा छुड़ा गये...... झुकती कमर के दुर्बलकन्धे कहाँ तक इस कच्ची-पक्की गृहस्थीके साथ .......।
Divya Singh
इतनी ममता और त्याग केवल औरत ही कर सकती है
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Anshul
very nice story
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Meera Singh
good story
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rashmi srivastava
Nice..
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ram sewak
Bahut खूब
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प्रभु दयाल मंढइया
श्रृद्धेय डा. राजेश रस्तोगी जी, "सुगन्धा " जैसी हृदयस्पर्शी ममत्व तथा वात्सल्य से भावविभोर कर देने वाली कालजयी रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई और साधुवाद।वैसे आप जैसे सुविख्यात साहित्यकार को मैं अनजान सा लेखक क्या बधाई दूं,आप हिन्दी साहित्य के ज्योतिपुंज हैं। फिर भी मैं नारी के त्याग तथा करूणा स्वरूप को परिभाषित करती इस कहानी के लिए आपको बधाई देना अपना कर्तव्य समझता हूँ। भाषा शैली तथा शब्दचयन माणिक कंचन समान जगमगाते कथा का मार्ग प्रशस्त करते प्रतीत होते हैं।असहाय वेदना की दबी-दबी सी चीत्कार हृदय विदारक है।ईश्वर से करबद्ध निवेदन है कि वे आपको आनन्दमय तता ऐश्वर्यपूर्ण दीर्घायु प्रदान करें।
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Vivek Tripathi
so emotional and nice story. keep writing.
umaguta
नदिया पार और हम आपके है कौन जैसी है ।
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Shashi Mishra
नारी तू नारायणी ऐसे ही नही है श्रेष्ठ रचना
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