सिलसिला

हिमांशु गुप्ता

सिलसिला
(69)
पाठक संख्या − 3487
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सारांश

"कितनी साँसों को सुनकर मूक हुए हो? कितनी साँसों को गिनना चूक गये हो? कितनी सांसें दुविधा के तम में रोयीं? कितनी सांसें जमुहाई लेकर खोयीं? कितनी सांसें सपनों में आबाद हुई हैं कितनी सांसें सोने में ...
Rajpal singh
very best story. shikshit
Mustak Bhori
Bahut achhi kahani.Dil ko chhu gai.jab apne logo ko taqlip hoti hai to dil rota hai lekin dusro ki taqlif ko hm najar andaz krte hai.Is kahani me yahi btane ki koshish ki hai.Good story.
nidhi Bansal
निःशब्द कर दिया आपने
Mamta Parnami
sach hai ye silsila kabhi nhi rukega
Shubham Soni
कहानी काफी प्रेडिक्टेबल थी
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