सामने की खिड़की वाला भूत

मनोज वेदप्रकाश पांडेय

सामने की खिड़की वाला भूत
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सारांश

अपने संघर्ष के दिनों में, मै, एक चार मंजिला भवन के रूम नंबर 558 में रहा करता था, जो, डी.एन. नगर, अँधेरी पश्चिम, मुंबई में स्थित है, इस एक कमरे में चार लोग मिलकर गुज़ारा किया करते थे, हम चारों लोग ...
Mridul Joshi
मनोज जी!आपने मानव जीवन के संघर्ष मय एकाकी जीवन का बहुत स्वाभाविक वर्णन किया है।एकांत में जाने अनजाने किसी सजीव या.निर्जीव की उपस्थिति मन में साकार रुप बना लेती है। और कब व खाली मन में ऐसी पैठ कर लेती है मानो वह केवल हमारै लिऐ ही बनी है और हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है। उस खिङकी में कौन था आपका न जान पाना एक अनसुलझा पश्न बना रहा..आपके लिऐ आकर्षण केन्द्र बना रहा
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MEGHA TRIPATHI
👌👌👌👌👌👌👌👌
Sushila Chanani
interesting story.when some body is struggling in life he needs some inspiration. But in city like Bombay no body had time for others.so an imaginary friend was created in the form of tree and the shadow in the window otherside.but when success came there was no time for imaginary friends.This is our point of view now a days.we make friends àccording to our need. The story potrates the complexity of modern age.
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Surendra Wadekar
सूंदर
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Divya Prakash Gahlout
good
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Pawan Pandey
RADHE RADHE BAHUT SUNDAR KAHANI
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