संक्रांति काल - पाषाण युगीन गाथा 3

और्व विशाल

संक्रांति काल - पाषाण युगीन गाथा 3
(10)
पाठक संख्या − 426
पढ़िए

सारांश

शुरू में धारा को भय लगता था अम्बी के साहस से ,मगर धीरे धीरे उसे गर्व होने लगा अपनी उत्पत्ति पर ।अब बस वो अम्बी के योग्य पुरुष की तलाश कर रही थी पर शायद अभी तक उनके वन पर दुसरे गुफापुरुषों की नजर नहीं पडी थी ।
रमेश तिवारी लल्लन गुलालपुरी
Nice हमारी भी रचनाओं का अवलोकन करे
रिप्लाय
Ramniwas Bishnoi
अति सुंदर
रिप्लाय
पल्लवी राय
बहुत सुंदर विषय और कहानी👌
रिप्लाय
रविन्द्र
अच्छी कल्पना ।सम्भवतः मनुष्य के सामाजिक और पारिवारिक होने की कथा कुछ ऐसी ही होगी।सुंदर रचना।।
रिप्लाय
योगेश
excellent
रिप्लाय
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.