शोक का पुरस्कार

मुंशी प्रेमचंद

शोक का पुरस्कार
(220)
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सारांश

आज तीन दिन गुज़र गये। शाम का वक्त था। मैं युनिवर्सिटी हॉल से खुश-खुश चला आ रहा था। मेरे सैकड़ों दोस्त मुझे बधाइयाँ दे रहे थे। मारे खुशी के मेरी बाँछें खिली जाती थीं। मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी आरजू ...
अशोक कुमार खत्री
प्रेम और समर्पण की ऊंचाई
Ramesh Chandra
mere pas likhne ke liye shabd nahi hai.Is kahani ko mene dil se parha hai.
Rajender Saroha
बहुत ही उम्दा रचना है
urmila
इतने महान लेखक की कृति पर कोई टिप्पणी देना छोटा मुहँ बड़ी बात होगी
Babu Gaikar
सुंदर नहीं अतिशय सुंदर शब्द रचना
Sunil Saini
आप का जवाब नही, बहुत खूब ।
Naveen Singh
bahut sundar or marmik kahani
SHALINI YADAV
सुंदर रचना है
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