शून्य से शून्य पर

डॉ.प्रणव भारती

शून्य से शून्य पर
(19)
पाठक संख्या − 3765
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सारांश

अचानक अपने पापा की दुर्घटना की खबर से नेहा का मन विचलित हो उठा,उसके हाथ-पाँव थरथर काँपने लगे ,हाथ में पकड़ा फोन डोरी सहित हवा में झूलने लगा और वह पलँग पर धम्म से असमंजस व थरथराती बेहोशी की सी स्थिति ...
Chetan Sood
ATI sundarप्रयास है शून्य को साकार करने का। उषा सूद।।।।।।
अर्चना अनुप्रिया
Is kahaani me ek durghatna se shuruaat karke fir usi jagah par ek durghatna dwara kahaani ka ant kar lekhika ne yah bataane ki koshish ki hai ki har jivan ka aarambh shunya se shuru hokar aage badhata hai,apani unchaaiyan chhuta hai aur ant me usi shunya me vileen ho jata hai.Ek larka jo apne pita ki mrityu ke baad Neha ke pita ke paas parvarish paata hai ,antatah usi jagah par unhen bhi kho deta hai.Wah pahle bhi akela tha aur ant me punah akele hoone ki vedna jhelata hai.Puri kahaani me neha ke pita ke swabhaav ka varnan hua hai aur unka prakriti prem darshayaa gayaa hai. Kahaani me bhasha aur uski satikata lekhika ke manobhaav achchhi tarah prakat karati hai.Ek maayane me kahaani ka saar atyant hi darshanik hai aur shirshak ko sarthak karta hai . Lekhika ko bahut bahut badhaai..
प्रदीप कुशवाहा
कहानी का अंत तों जरुर  कुछ प्रभाव छोड़ रहा , बाक़ी कथा पाठक को बाँधे रखने में असफल दिखती है . मैं समीक्षक तों नही हूँ , काफी देर तक तों समझ नहीं आता लेखक क्या कहना चाहता है अपने पात्रो के माध्यम से . अंत में स्पष्ट होता है कि एक दुर्घटना को आखिरी दुर्घटना के साथ जोड़ना था इन्हें .  अच्छे प्रयास हेतु सादर बधाई 
Manju Mahima
एक विचित्र सी जिज्ञासा जगाती कहानी , लगता है लेखिका जैसे स्वयं ही  उन घटनाओं का अनुभव करके लिख रही है, सहज, सरल और स्वभाविक भाषा का प्रयोग करते हुए लेखिका ने अंतर्मन को छुआ है...एक कडवा सच उकेरा है लेखिका ने कि कैसे ऊँचाइयों को छूता हुआ व्यक्ति अचानक ही बिना किसी रोग के अचानक  दुर्घटना का शिकार हो शून्य हो जाता है और यही इस कहानी के शीर्षक की सार्थकता है...लेखिका को बधाई और शुभकामनाएँ....
Nisha chandra
Excellent stroy brilliantly written by a very sensitive writter.Atyant samavedanshil kahani.Heartiest congratulations and thank you for the amazing stroy.  
SUBHASH THAKKER
"Shunya se Shunya Par."... from "Nothing to Nothingness.," truly the Ttile justifies the very core of the story. Pranavji has succeeded in making an impact on the readers mind and heart to expose the delicate strings of relationships  in Life. Painful begiing with Death...ends also in same Pain with Death. That itself is the justification of Nothing to Nothingness (Shunya se Shunya Par) Excellent efforts to invlove the reader with fast paced Life happenings..with suspense,with curosity,with anticipation of next event ! All the Best to Pranavji..to continue giving us such nice heart touching stories.. making one truly realise the Philosophy of Life...and its vulnerability to merge into Nothingness ! Congrats and best wishes with due Respect and Regrds to Pranavji !    
રામ ગઢવી
very nice story congratulations
मंजू महिमा
बहुत भावप्रवण कहानी...डॉ. प्रणव भारती की सशक्त लेखनी से निस्रत यह कहानी मन को संवेदित करने में सक्षम है...इसके लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई...मंजु महिमा.
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