शाम की सब्जी

डा.लक्ष्मी शर्मा

शाम की सब्जी
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सारांश

"आज फिर मटर-मलाई! मुझे नहीं खानी ये सब्जी। रोज गोभी, रोज मटर ,वो ही दाल, वो ही चावल.. कुछ अच्छा नहीं बना सकती तुम।" कविष ने भुनभुनाते हुए थाली सरका दी। "बेटा, मैं क्या बनाऊँ फिर? तुम मेथी-पालक भी तो ...
ANUPMA TIWARI
कोई भूख का मारा है, कोई स्वाद का मारा। माँ बेचारी दिमाग और हालात की मारी। क्या बनाये रोज रोज। बच्चों को कोशिश करे सब खिलाने की। उनका महत्व बताने की। बाहर की चीज़ों का स्वाद ही मत लगाइये।
Shaline Gupta
सही कहा आपने हर किसी की जरूरत और पहुँच अलग अलग होती है।👍👍👌👌💐💐😊😊
Khanak Sharma
yahi too dukh ki baat hai bachhy nahi samajhte😥😥
Pratibha Saxena
Har Ma ki pareshani aaj kya banaye achchi rachna
Davinder Kumar
आमजन की परेशानियों पर आपने अच्छी कथा लिखी है
neeta
samaj ke ameer aur gareeb ka antar darshati ek yatharth kahani
Shashi Mishra
दोनों ही वर्गों की एक ही समस्या पर भावनाऐं अलग हैं। बहुत खूब।
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