शहर जो आदमी खाता है

Tejas Poonia

शहर जो आदमी खाता है
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सारांश

उसके इस तरह आने पर मैं अचानक चौंक पड़ा और उससे नाम पूछता उसके बीच उसका फोन बज पड़ा । हम तेरे शहर में आएं हैं, मुसाफिर की तरह, सिर्फ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे । वह फोन पर बतियाने लगा पर मेरा मन उस गाने को गुनगुनाते हुए  अपने गाँव के चक्कर लगा आया । और मैं अपने गाँव से शहर तक की छ: सालों की यादें संजोने लगा । शायद मेरा माजी मुझे अपनी कैद से बाहर नहीं निकलने देता था और माज़ी में रहने वाले अक्सर अपना मुस्तकबिल खो दिया करते हैं ।
Davinder Kumar
आप की कहानी वास्तविकता और फिल्मी कहानी के बीच चलती रहती है पर आपने चित्रण बहुत अच्छा किया है बधाई हो
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डॉ.अनुराधा शर्मा
बहुत अच्छी कहानी
mukesh nagar
बहुत सुंदर रचना तेजस जी! बधाई और शुभकामनाएँ इतने अच्छे लेखन के लिए।
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Chetan Lakhwani
aapko hum kuch likhe itni kabiliyat khaan hum me sir relly great work
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Gopal Parihar
बहुत बढ़िया शुरुआत है।ईश्वर तुम्हें सफलता प्रदान करें।
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Dinesh Kumar
Nice story
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Leena Sinha
तेजस की कहानी भावपूर्ण है । और कहानी लेखनं की शुरुआत जब भाव से हुई है तो आगे लेखक की लेखनं यात्रा सफलता की बुलंदियों को अवश्य ही छुएगी ।
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