वो प्यारी मां और मासूम वैश्या

अंश तिवारी

वो प्यारी मां और मासूम वैश्या
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सारांश

वो कोठों पर बैठी रही,आज-कल और हर पलझांकती रही दरवाजों की दरख्तों से,उसे इंतजार चमड़ी कोनाखूनों से खुरचने वालों का था,हर कोई उसके दर्द को नहींउसके तन को समेटना चाहता था,बड़े शौक से उसका दीदार होता,आंखो
Ankur Gupta
नि:शब्द हूं मैं इतनी उत्तम रचना पढ़कर
विनोद कुमार राव
लाज़बाब , कोई शब्द नहीं है मेरे पास। जितनी तारीफ करूं उतनी कम है सुंदर अतिसुंदर
सुखचैन मेहरा
जी, बेहतरीन रचना आ0...💐💐💐
सौरभ वर्मा
एक धंधे वाली का ऐसा मार्मिक चरित्र चित्रण! निःसंदेह, रुपये बनाम शारीरिक भूख के मुकाबले को अन्योन्याश्रय संबंध की तरह दिखाया है आपने। जिसमें किसी व्यक्ति की शारीरिक भूख मिटने पर किसी घर का चूल्हा जलता है।
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