वीज़ा

डॉ. लवलेश दत्त

वीज़ा
(299)
पाठक संख्या − 13384
पढ़िए

सारांश

“हैलो...हाँ बेटा कैसे हो?” “मैं ठीक हूँ माँ...तुम कैसी हो?” “मैं भी ठीक हूँ बेटा...और शिल्पी और चीकू कैसे हैं?” “सब ठीक हैं माँ, तुम्हारी याद आ रही थी।” आवाज़ में उदासी छा गयी। “अरे...क्या हुआ? इतना ...
मंजू सिंह
बहुत सुंदर! आंखें भर आईं आपकी कहानी पढ़कर। यही हो रहा है समाज में आजकल । जभी कभी तो बेटियां भी मां बाप को बोझ समझ लेती हैं। जिन बच्चों के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी,तन मन धन सब लगा दिया हो उनकी बेरुखी सचमुच तोड देती है।
Sita Aryal
The story is admirable. It's all about selfish son which is mostly seen in today's society. The ending is also good. Best of luck for further writing.
Poonam Aggarwal
दिल को छू जाने वाली कहानी है ।
DINESH GILRA
आज के सामाजिक मूल्यों के होते पतन के समय की सच्ची कहानी लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता हैं किंतु अपनी सामाजिक सोच समस्या खड़ी करती हैं
sandeep
ह्रदय स्पर्शी कहानी बहुत अच्छी|
karan rajawat
अति उत्तम।
sunita
kadavi sachhai h bt fir bhi bete to bete hi hote h chahe Jese bhi
Divya Singh
मर्मसपर्शी
Meenal Choradia
बहू क्यों भूल जाती है कि वो भी बेटी है उसकी भाभी उसकी माँ के साथ ऐसा ही करे तो कैसा महसूस होगा?कड़वी सच्चाई
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.