वीज़ा

डॉ. लवलेश दत्त

वीज़ा
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सारांश

“हैलो...हाँ बेटा कैसे हो?” “मैं ठीक हूँ माँ...तुम कैसी हो?” “मैं भी ठीक हूँ बेटा...और शिल्पी और चीकू कैसे हैं?” “सब ठीक हैं माँ, तुम्हारी याद आ रही थी।” आवाज़ में उदासी छा गयी। “अरे...क्या हुआ? इतना ...
DINESH GILRA
आज के सामाजिक मूल्यों के होते पतन के समय की सच्ची कहानी लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता हैं किंतु अपनी सामाजिक सोच समस्या खड़ी करती हैं
sandeep
ह्रदय स्पर्शी कहानी बहुत अच्छी|
karan rajawat
अति उत्तम।
sunita
kadavi sachhai h bt fir bhi bete to bete hi hote h chahe Jese bhi
Divya Singh
मर्मसपर्शी
Meenal Choradia
बहू क्यों भूल जाती है कि वो भी बेटी है उसकी भाभी उसकी माँ के साथ ऐसा ही करे तो कैसा महसूस होगा?कड़वी सच्चाई
नीता राठौर
कई घरों की यही आपबीती है। जाने के बाद बेटे एक बार भी पलटकर नहीं देखते कि हमारे माता पिता किस हाल में जी रहे हैं और माता पिता हैं कि सब जानने समझने के बाद भी लोक दिखावे के लिए अपने बेटे को दोष नहीं देते।
Sarla Taluja
मां की ममता से भरी सुदर रचना
Shashi Mishra
मां की ममता से भरी सुन्दर रचना।
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