लगाव

sakshi sinha

लगाव
(2)
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सारांश

एक जिन्दगी तू भी बेरगं सी रे मोला खजाने का तू ही हिसाब करे जो मैं पत्थर मानु कल्प मोती कहे। एक ही मोती मैं मागूं मुझे मेरा हीर लोटा दे फासला इतना ही बस करे न छूटे आत्मा से देह अरबो विनतियो की पुकार ...
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