रेत

विक्रम श्रीवास्तव

रेत
(56)
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सारांश

बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था, जो हल्के कपडे के परदे से ढँका हुआ था| मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ति या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी रहा हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी| छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था| पंखे से ठीक नीचे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी| चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे| उसी चादर पर बैठी थी वो, गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में,मुस्कुराती हुयी "आओ साहब...क्या लोगे??"
महेंद्र कुमार
एक अजीब सी कहानी जो अजीब रिश्ते को वयां करती है, सुन्दर चित्रण....
Devendra Kumar Mishra
भावो को सही संजोया है। लेकिन रेत को हमेशा हमेशा के लिए मुठठी में बंद कर लेते तो समाज मे इसका एक अच्छा उदाहरण होता ।इन ज्वलंत समस्याओं को सिर्फ कलम के माध्यम से ही बंद किया जा सकता है।
Vipin Singh Rana Rana
एक कल्पना, जो विचारों के सहारे चल रही है
NareshPal Kashyap
very nice and heart touching story
Bikash Barnwal
Likhne ka andaaj wakai, beautiful
Satyam Soni
Jaane Kya raaz chupa hua h ..........
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