रेत

विक्रम श्रीवास्तव

रेत
(73)
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सारांश

बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था, जो हल्के कपडे के परदे से ढँका हुआ था| मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ति या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी रहा हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी| छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था| पंखे से ठीक नीचे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी| चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे| उसी चादर पर बैठी थी वो, गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में,मुस्कुराती हुयी "आओ साहब...क्या लोगे??"
Preeti Chauhan
bahut kuchh ankah Bataan kar diya...
हनीश मदान
गज़ब भाई , बहुत ही गज़ब लिखा है, दिल हर किसी मे धड़कता है जज्बात सबमे होते है पर सही समय पर लोग इसे समझ नही पाते..!!
Kamal Bishnoi
भावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति... यह लेखन नहीं आप-बीती भी हो सकती है।
upendra
सशक्त रचना... अच्छा हुआ रेत सही समय पर फिसल गई, हमारा नायक समाज से लडकर क्या रेत को स्थायि रुप से थामने का जोखिम ले सकता था???
Sunand Sharma
The starting was good and impact full, the way you describe setup of room is really nice , read my story # veshya # based on some what similar lines.
महेंद्र कुमार पाल
एक अजीब सी कहानी जो अजीब रिश्ते को वयां करती है, सुन्दर चित्रण....
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