रेत

विक्रम श्रीवास्तव

रेत
(93)
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सारांश

बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था, जो हल्के कपडे के परदे से ढँका हुआ था| मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ति या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी रहा हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी| छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था| पंखे से ठीक नीचे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी| चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे| उसी चादर पर बैठी थी वो, गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में,मुस्कुराती हुयी "आओ साहब...क्या लोगे??"
Deepak Dixit
वाह क्या बात
Bss
Bss
अच्छी है
ajay
एकदम अलग।कहानी और पात्रों के मध्य संबंध की विचित्रता आगे की कल्पना नहीं करने देती।अतः आरम्भ से अंत तक पढ़ी।
निशान्त बाजपेई
ख़ूबसूरती के साथ आपने दोनों किरदारों को पर्याप्त विकसित किया है ,, कहानी में कसाव भी है ,, , इस उत्कृष्ट रचना पर आपको अनेकों शुभकामनाएँ ।
Preeti Chauhan
bahut kuchh ankah Bataan kar diya...
हनीश मदान
गज़ब भाई , बहुत ही गज़ब लिखा है, दिल हर किसी मे धड़कता है जज्बात सबमे होते है पर सही समय पर लोग इसे समझ नही पाते..!!
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