रेत

विक्रम श्रीवास्तव

रेत
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सारांश

बायीं दीवार पर एक लकड़ी का मंदिर नुमा बक्सा लगा था, जो हल्के कपडे के परदे से ढँका हुआ था| मंदिर के अन्दर कौन सी मूर्ति या तस्वीर थी पता नहीं। पर जो भी रहा हो उस भगवान को इस कमरे में होने वाली बातो को देखने की इजाजत नहीं थी| छत के बीचो बीच एक पंखा था जो केवल चलने के लिए चलता था| पंखे से ठीक नीचे एक पलंग था जिस पर फूल पत्तियो के प्रिंट वाली चादर बिची थी| चादर पर दाग नहीं थे मगर उनकी कमी कुछ छेद पूरी कर रहे थे| उसी चादर पर बैठी थी वो, गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में,मुस्कुराती हुयी "आओ साहब...क्या लोगे??"
Bikash Barnwal
Likhne ka andaaj wakai, beautiful
Satyam Soni
Jaane Kya raaz chupa hua h ..........
Sanjeev Kumar
बेहतरीन और भावनात्मक कहानी सुंदर लेखनी
Shashi choudhary
Great story.....I m speechless....
प्रवीण कुमार 'आकांक्षी'
विक्रम जी कहानी अत्यंत रोचक और भावोत्प्रेरक है .l आपकी कहानी पढ़कर मुझे अपनी एक कविता याद आ गयी l जिसका शीर्षक है ,रिश्ता दर्द का ' अवसर मिले तो पढियेगा और अपने विचार दीजिएगा ...
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