रीति- रिवाज़

मंजू सिंह

रीति- रिवाज़
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सारांश

रीति रिवाज़ कभी कभी ऐसे मोड़ पर आ जाते हैं की उन्हें निभाना जीते जी मरने से भी बदतर हो जाता है .. ा समय आ गया है की ऐसे रिवाज़ों को हम खुद ही तोड़ de
Vibhor Gaur
कहानी की अच्छी शुरुआत की लेकिन सिर्फ एक बातचीत से अंत समझ में नहीं आया, प्रीति रूढ़ियों पर प्रहार करने की जल्दबाजी में कथानक कुछ जल्दी ही समेट दिया क्या लगता है।
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Amrita Sharma
क्या आपको आज के समय में भी ऐसा लगता है कि एक पढ़ी - लिखी और आत्मनिर्भर महिला इतनी लाचार होती है ? यदि पति साथ नहीं देता तो वह बस लाचार होकर अपने और अपने माता - पिता के साथ हो रहे अन्याय को चुपचाप देखती और घुटती रहती । नजरिया बदलिए । इसे " विशेष कहानी " का दर्जा भी मिल गया , यह तो एक गलत मानसिकता को बढ़ावा देना हुआ ।
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Punam Saxena
bahut achhi story h samaz ki kuprathao ko todna hi chahiye
मनोज भारती
अच्छी कहानी है। किंतु आश्चर्य होता है कि दो वर्षों के लंबे अंतराल में भी पति-पत्नी एक दूसरे से पूरी तरह नही खुल सके न ही एक दूजे को अच्छी तरह समझ पाए। वरना ये दुविधा मन में होती ही नहीँ। खैर, अंत भला सो भला।
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डा. मनसा पाण्डेय
Ensan banaya hai ,bhi Tod skta hai.bahut achah hai.
Ritu Anand
Bahut sunder story 👌🏻
कुसुमाकर दुबे
बहुत अच्छी है।
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