रितिका

विनय तिवारी

रितिका
(123)
पाठक संख्या − 8447
पढ़िए

सारांश

'रितिका' एक काल्पनिक कहानी है, किन्तु समाज और जीवन में घटने वाली कुछ घटनाओं का आइना भी है। इस कहानी में मैंने मनुष्य के हृदय में उत्पन्न होने वाले बहुत से भावों जगह दी है, उम्मीद है आप इसका अनुभव जरूर करेंगे पढ़ते वक्त। कहानी के लिए सुझाव व आलोचना का स्वागत है। ,,,,,,,,,,,,,,,,एकाएक मेरी सांसे थम सी गयी ...हां हां ये वही है जिसको मै स्टेशन पर खोज रहा था । जीवन में पहली बार किसी के लिए इतना व्याकुल हुआ था। वो विंडो सीट पर बैठी बाहर के दृश्य देख रही थी...हवा की वजह से उसके बालों ने आधे चेहरे के ढक रखा था। उसके पास बैठी आंटी जब हरौनी स्टेशन पर उतर जाती है तब मै अपने कलेजे की धक धक कॊ कंट्रोल करते हुए उसके पास वाली सीट पर बैठ गया। बीते सोमवार उसे 100 मीटर की दूरी से देखा था...आज यह दूरी 10 सेंटीमीटर रह गयी, यह सोच ही रहा था कि खटाक की आवाज आयी ...उसने खिड़की बंद कर दी और सामने देखने लगी। मैं बात करना चाह रहा था किन्तु होंठ सिले हुये थे और शब्द बिखरे पड़े थे, कंठ मूक था और हृदय की धक धक अभी भी चालू थी। कुछ समय के बाद अपनी ख़ामोशी कॊ तोड़ते हुये अखिर बस इतना पूछा "जी कानपुर जा रही है ?" और फिर दूसरी तरफ देखने लगे...कुछ सरसराहट की आवाज आयी ...वो मेरी ओर मुड़ कर देख रही थी, इतनी सी बात से मै घबरा गया और इयरफोन कान में लगा के गाना सुनने लगा -" लो मान लिया हमने है प्यार नही तुमको..."
Piyush Singh
Ek baar mujhe v ritika se mila do ! waisi ladki k sath aisa nhi hona chahiye tha
Sheshmani Namdev
Story achchi thi.. Bt yogesh ko feel krwana tha k usne galt kiya
Krishna Bhai
kahani achhi thi lekin yoges ko sabak sikhana chahiye tha
reena
👌👌👌👌
Shantanu awasthi
speechless wonderful story
Deepak Kumar
aatyant khoobsurat......sukriya.....
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.