रास्ते

अरुण झा

रास्ते
(2)
पाठक संख्या − 16
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सारांश

रास्ते सुगम हों,जरूरी तो नहीं मंजिल मिल जाए,मुमकिन तो नहीं जिंदगी ढूंढ लेती है फिर भी रास्ते पत्थरों पहाड़ों के बीच उफनती नदियों के बीच बियाबाँ वादियों के बीच अकेलेपन की त्रासदी के बीच नन्ही सी ...
Alka Mishra
बहुत खूब लिखते हैं आप सर ।दिल से निकले अल्फाज
Rachna Singh
सचमुच जीने के बहाने ढूँढ ही लेती है जिन्दगी हकीकत के करीब...बहुत सुन्दर रचना
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