रांग नम्बर

डॉ. लवलेश दत्त

रांग नम्बर
(83)
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सारांश

“हैलो...हैलो...अंकित बेटा...हम पहुँचने वाले हैं...ट्रेन आउटर पर खड़ी है।” “अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन ...
Pawan Pandey
बेहतरीन रचना। यह कहानी भगवान करें वास्तविकता में न बदले।
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Sunita Agarwal
So sad
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Vimlesh Yaduvanshi
👌👌👌😢😢😢
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Chhaya Singh
bahut hi sunder story
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Shiv Sharan Singh Bhadauria
आधुनिक समाज का बहुत बढ़िया दृश्य दिखाया ।
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Satinderjit Bhatia
sad but true story
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madhu
v sad story
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Pratima Dey
Best स्टोरी
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Sutapa Sen
better truth of life ,but remember one thing history repeat himself ,it is universal truth
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Anjali Chaudhary
Bahut hi aache Tarike se aapne vartmaan Samay ko darsaya h. Is kahani k bare me jitna bhi ikhu kam h..
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