रहोगी तुम वही

सुधा अरोड़ा

रहोगी तुम वही
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सारांश

( एक) 'क्या यह जरूरी है कि तीन बार घंटी बजने से पहले दरवाजा खोला ही न जाए? ऐसा भी कौन-सा पहाड़ काट रही होती हो। आदमी थका-मांदा ऑफिस से आए और पाँच मिनट दरवाजे पर ही खड़ा रहे...' ... ... ... 'इसे घर कहते ...
आशुतोष कुमार
जीवन को बदलने की शक्ति है आपकी कहानियों में।
Baljeet Kaur
kya likha he aapne 😊😊
हेमंत यादव
पुरुष प्रधान समाज की सच्चाई
Varinder Kaur
Shi Lekha hy Apne esa he hota hai auraton k sath
Kusum Rajoria
हर घर की यही कहानी है कही ज्यादा तो कही काम।महिला चाहे नौकरी करे या ना करे पर उसे यही सुनना है(कुछ अपवाद तो हर जगह है)अच्छी रचना है
Renu Lata
हा,हा😅😅😅एसा लगा जेसे मेरे घर को और मुझे देखकर आपने लिखा हो।।। जेसे स्त्री का स्वाभिमान ही नही है , पुरुष की नजर में 👏👏👏
Poonam Aggarwal
लगता है जैसे प्रयेक मध्यमवर्गीय दम्पति की कहानी है । सचमुच दिल को छू गई । आपका आभार ऐसी रचना के लिये । नमस्कार ।
kumar gourav
निशब्द कर दिया आपने।एक-एक शब्द.बेहद़ वास्तिवक।कहानी कहने का यह भी एक तरीक़ा।
Anju Bhadana
👏👏👏👏👏
Anu Radha
Jo v tha bada mst tha. aage ki kuch line to mere ghr ki lag rhi thi. Or mera Sabse fvrt paara tha jaha husband apne maa ka example de rha tha. Same mere hubby v kahte h. Tumse to kapra saaf nhi hota meri maa to ek wash me saaf kr deti thi. Tumse ghar nhi smbhalta meri maa 4-4 bacho ko dekhte huye ghr sambhalti thi. bla bla bla bla.....
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