मैं ब्रा हूँ

जयेश जेतावत

मैं ब्रा हूँ
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सारांश

मेरी गुमनामी की ज़िंदगी कुछ ऐसी है कि मुझे छत पर खुले में सुखाया नहीं जाता। टांग दिया जाता है किसी साड़ी, जींस या टी-शर्ट के नीचे छिपाकर। ताकि पड़ न जाए नजर किसी पड़ोस के मर्द की मुझ पर। क्योंकि फूल जाती है सांसे उसकी देखकर मुझे। पकाने लगता है वो ख्याली पुलाव, चला जाता है मन उसका कल्पनाओं के संसार में। शायद हो भी सकता है खड़ा एक अपराध नया, या फिर बहा देता है सारे अरमान वो गली की नाली में...
Nisha singh
बहुत उम्दा
Shashi Mishra
एक दम सही।कपडा है कपडा ही समझो।जिस्म नही।सच में समय बदल रहा है।बदलना भी चाहिऐ
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Amit Kumar
सही लिखे पर ज़माना बदल रहा है...ये मानसिकता भी जल्द दूर हो जाएगी..कम से कम शहरों के बारे में तो कह सकते हैं..
Manoj Tank
बहुत बढ़िया
दीपक पपनेजा
बिल्कुल सही लिखा है
Vikki 16
वाहियाद लेख , महाशय कृपया शिश्न के बारे मे भी लिखे वो भी हमेशा अन्दर रहता है😂😂🤓
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Varun Dhawan
Baat ye niii ki Ye cheej buri hai baat ye hai ki isko kis nazariye se dekh ja rha hai dekhiye ye sv hm insaano ne to niii kiya hai ye kudrti hai jo suru se chla aa rha hai ye ek private cheej hoti hai jo sbse discss niii ki ja skti
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