मैं और तू

ओमांश

मैं और तू
(19)
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सारांश

अच्छा सुन!  तू मुझे तुम क्यों बोलती है यार। जब हम तू-ता में बात किया करते थे तो कितना अपनापन सा लगता था।    महाशय! तब हम दोस्त हुआ करते थे, मियां-बीवी नहीं। अभी कोई औरत अपने पति से 'ओय सुन ' , 'तू कहां है ' बोले ना... तो जानते हो...
डॉ. प्रवीण पंकज
बहुत बढ़िया।
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SG
किसी की याद दिला दिए ओमेश जी... बस इतना ही कहना चाहूंगा. बंद कमरों में रोशनी ना बुझाया कर... इस क़दर ना फिर याद आया कर और ताउम्र बीत जाएगी तू ता करते करते यू ना आप कह के बुलाया कर.....
nafis
तु आप को बराबरी मे लाता है। अच्छा लिखा
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sushma gupta
SO nice
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Nittu kumar
अच्छी रचना,अच्छी सोच👌👌👌👌। जो बात और अपनापन " तू" में है वो "आप" मे नहीं।
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मोनिका
वास्तव में समाज में इज्जत बनाए रखने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता इंसान को।। सबसे बड़ा रोग.., क्या कहेंगे लोग।। है ना।
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Vidya Sharma
lovly😊👌👌👌👌👌sach me aaj riste me apnapan km ho gya hai dikhawa jada hai
Chandramohan Kisku
बहुत बढ़िया , चाहे दुनिया कुछ भी कह ले मगर तू कहने में अपनत्व है वह तुम और आप में नहीं है .पर समाज के नजर में पत्नी को इज्जत देने का भी तो नाटक होना चाहिए .
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