मेरी लघुकथाएं

ओमप्रकाश क्षत्रिय

मेरी लघुकथाएं
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पाठक संख्या − 2189
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सारांश

......माँ ने मोटरसाइकिल की और इशारा किया , " देख रमेश , तेरी बीवी को ! लोग कहते है कि पति के होते हुए वह दूसरे के साथ ...." ........" क्या ?" अपने बेटे बबलू को घर के बाहर पड़ी रेत पर घरौंदा बनाना ...
Barkha verma
Sari achi h but sbse achi Kam mange aayi us greeb mhila ki lgi
मनमोहन कौशिक
सभी लघुकथाएँ स्तरीय हैं।कृपया मेरी भी लघुकथाएँ देखे।
दोषी
कहानी का अर्थ समझ में नहीं आया?
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नृपेन्द्र शर्मा
बहुत अच्छी लघुकथा हैं sir
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Kavi Rohit Kumar
आखरी कथा में ही जान थी। बाकी सब समझ ही न आयी।
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ओमप्रकाश क्षत्रिय
लघुकथाएँ पढ़ कर लगा कि ये लघुकथाएँ कब प्रकाशित हुई. फिर याद आया कि ये प्रतिलिपि की देन है. शुक्रिया प्रतिलिपि इस उपहार के लिए. हार्दिक बधाई .
Bhuvneshwar Chaurasiya
सभी लघुकथाएं बहुत अच्छी है कहीं कहीं शब्दों की अशुद्धि है उसे पढ़ कर पुनः सुधार किजिए बहुत बहुत बधाई।
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