मुकम्मल इश्क़

kanchan pandey

मुकम्मल इश्क़
(9)
पाठक संख्या − 212
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सारांश

टूट जाते हैं ये रिश्ते,बिन किसी आवाज़ के, जैसे टूटे हैं ये तारे दूर कहीं आकाश के। लौट आते तुम भी इक दिन,भूलकर शिकवे सभी, उम्मीद में कि आओगे तुम, हम तो हैं बैठे यहीं। कब कहो किसे प्यार ने ,है कहाँ ...
G. K.
👌👍❤️👍👌
RAHUL HARSHWARDHAN
मुक्कमल इश्क़ हो जाए तो खुदा की जरूरत न पड़ती
काव्याक्षरा
सुंदर भाव! किंतु कविता की विषय वस्तु के अनुसार शीर्षक "नामुकम्मल इश्क" होता तो बेहतर हौता।
रमेश मेहंदीरत्ता
अच्छी रचना है, और भी लिखिए
Chaand
Sahi kaha ji aapne bahut achha likha memm
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