मन बावरा

Neha Sharma

मन बावरा
(104)
पाठक संख्या − 608
पढ़िए

सारांश

"अरे भई अभी तक वहां फूलों की मालाएं क्यों नहीं लगाई और सामने वह सामान अभी भी वैसे ही बिखरा पड़ा हुआ है। उफ! कितने ढ़ीले हैं ये  लोग।" यह कहते हुए राघवसिंह के कदम तो आज रुक ही नहीं रहे थे। दो दिन से ...
संतोष नायक
'वे सभी लोग इसके लिए दोषी है जो इस जुर्म को सहते है '।सही बात रचना'मन बावरा'अच्छी लगी,बस कहानी घटनाप्रधान न हीं लगी।
रिप्लाय
brajmohan pandey
आदमियत अब नहीं रही।दहेज एवं पिता के प्रति पुत्री का प्रेम चित्रण मार्मिक है ।भीड़ मे भी आदमी अकेला रह गया है।आपकी सोच के लिए साधुवाद।आदमियत पर मेरी रचना आदमी पढने का कष्ट करें।
रिप्लाय
शिशिर श्रीवास्तव
अच्छा लिखा है पर थोड़ी नये पन की कमी महसुस हुई
रिप्लाय
आशीष कुमार त्रिवेदी
समाज की सोंच में बदलाव ज़रूरी है। ऐसे कड़े फैसले जैसा वर्षा ने लिया ही इस समस्या को खत्म करेगा
रिप्लाय
सचिन बारोड़
कहानी नही सत्य है पर आखरी में आपने कहानी को थोड़ा और आगे लेजाकर अंत करना चाहिए था।
रिप्लाय
पिंकी राजपूत
पता नहीं इस कुप्रथा से कब मुक्ति मिले, सार्थक विषय!
रिप्लाय
Anuj Bhandari
अति उत्तम
रिप्लाय
Manju Saraf
बहुत अच्छा लिखा आपने
रिप्लाय
Alpa Mehta
बहुत ही संवेदशील विषय पर आपने अपने मौलिक लेखन की प्रस्तुति की है, ओर समाज मे जाग्रुति लाने का पूर्ण प्रयास किया है,,, बेहतरीन.. उमदा.. अदभुत.. ✍️✍️✍️..
रिप्लाय
सरोज
दहेज लोभियों को करारा जवाब देती हुई बेहतरीन रचना 👌👌
रिप्लाय
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.