मन का सुहागरात

देवेन्द्र प्रसाद

मन का सुहागरात
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पाठक संख्या − 21302
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सारांश

“तुम्हारे आत्महत्या वाले शब्द कानों में गूंज रहे थे। तुम्हें झिड़कने की ग्लानि भी थी मन में।  दीनू काका ने फोन करके तुम्हारी हालत बताई, तो मुझसे रहा नहीं गया। कार वापस मुड़वा ली। सोचा मीटिंग तो सारी ...
Mandeep Kaur
oh my God level of thinking, no words to praise, hats off
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Dr Pratibha Saxena
अत्यन्त उत्तम ,सहज सुंदर ,भावपूरित ,सुखान्त कथा ।प्रसाद गुण से ओतप्रोत लेखन हेतु कथाकार को साधुवाद एवं शुभकामनायें
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Mamta Jha
Wao very very very very very very very very very nice story
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Mohit Khare
यह वास्तविक प्रेम की परिभाषा है। बहुत सुंदर
Rashmi Sharma
dil ko chhu gyi nice story
Aashvi
ek aur behtrin rachna....👌👌
Sheetal Kour
man ko chhu lene wali story hai soooo nice nd amazing
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Darinka Sahu
ह्रदयस्पर्शी कथानक।👏👏👏👏
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Raj Kumar
Interesting... very Intresting. story 's concept I really like it.
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