मधुरिमा

Damini

मधुरिमा
(443)
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सारांश

मधुरिमा कैसे कहूं पी अब आ भी जाओ झूलन पडे है पी अब आ भी जाओ कोयल मरी अब जी जलाने लगी है अंबुआ पे बैठी छेड़े वो तान अब बगिया में बैठे भंवरे हंस हंस सतायें मोहे फूलों पे बैठी तितली खेलें है भौंरों ...
Rajendra Prasad Upadhyay
अद्भुत रचना
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Pooja Mani
जलन की अग्नि को बहुत ही अच्छा से लिखा है आपने,विरह की आग मे जलकर ही प्रेम परिपक्व होता है ।
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Aditi Tandon
बहुत सुंदर कहानी है आपकी , बहुत अच्छा लिखती हैं आप दामिनी जी 👌👌👌🙏🙏🙏
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Sriram Rajagopalan Iyengar
Beautifully written. Thank you . Learning the beautiful usage of words through your stories.
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Raj Bhalla
बहुत खूब, मधुरिमा ही नहीं पाठक भी नीलांजना और दिवाकर के संबंधों को गलत ही समझ रहे थे। अंत सुखद रहा। अच्छी रचना है।
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ज्योती जैसवाल
बहोत सुंदर जी
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हरमन बराड़
nice 👌👌
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डॉ. इला अग्रवाल
sundar sukhad ant kintu ye sab parikshayein stri ki hi q?patni aisa kare to kya pati sehan kr paayega wo to itne din k bichhoh me hi doosri stri ko var laayega...
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अभिषेक भारती
kahaniyo bahut hi marmik hai, apko शुभकामनाएं
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Poonam Aggarwal
सुंदर कहानी है ।
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