भूख

अरविन्द कुमार खेड़े

भूख
(6)
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सारांश

दिन भर सतपुड़ा भवन में खटने के बाद जब वे किसी होटल में गये थे । संस्था प्रभारी ने आर्डर देने का जिम्मा उसे सौंप दिया था । उसने स्वभावतः पूछा था, ‘‘क्या है खाने में  ? वेटर ने उत्तर में मेनू कार्ड थमा दिया था । उसे मेनू देखकर ही आष्चर्य हुआ था । छत्तीसों पेज का मेनू ? वेटर ने कुछ देर प्रतीक्षा के बाद पूछा था,  कि क्या लाना है ? उसने वेटर से पूछा, ‘‘इसमें दाल, सब्जी, रोटी कहां है ?” वेटर इस अनाड़ीपन पर चिड़ गया था । पन्ने निकालकर उसके सामने रख दिये । तब जाकर उसने अपनी पसंद की दाल, सब्जी और रोटी का आर्डर दिया था । फिर वर्मा जी और अपने सहकर्मी से कहा था कि, आपको इसके अलावा कुछ लेना हो तो आर्डर कर दे । मेरे ख्याल से इतना बहुत होगा ।  वेटर अपना सिर पीटता रह गया था ।
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