भूखे कुत्ते

Arun Ahuja "Insan"

भूखे कुत्ते
(8)
पाठक संख्या − 167
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सारांश

समृद्ध समाज मे भूखे बच्चे या भूखे कुत्ते बराबर ही तो है !
गजेन्द्र भट्ट
नहीं सहन कर पाता है दीन-हीन, विपन्न वर्ग की भूख और विवशता को हमारे समाज का तथाकथित साधन-संपन्न वर्ग! उसे तो इस सर्वहारा वर्ग के सदस्यों की स्मृति तब हो आती है जब घर के कामों में सहयोग के लिए सेवक-सेविका की आवश्यकता होती है। अरुण,आपको इस अच्छी रचना के लिए बधाई!
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aparna
उफ अंत वाकई हृदयविदारक था,तथाकथित बुद्धिजीविओं की बुद्धि कितनी छोटी हो सकती है,आपने अपनी पैनी कलम से उकेर के रख दिया,सशक्त भावपूर्ण अभिव्यक्ति 😊👌👌👌🙏🙏🙏💐💐
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Yogita Garg
बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने । स्थिति बदल रही है अब ।बचा हुआ खाना पार्टी वगैरा का किसी एनजीओ या फिर ऐसे ही गरीब बच्चों को खिलाया जाता है। जागरूक हो रहे हैं लोग धीरे-धीरे
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दीपिका पाण्डेय
अद्भुत,मार्मिकता से परिपूर्ण व्यंग्यकार शैली।शब्दावली का बेहतरीन उपयोग लाजवाब है।समाज पर व्यंग्यात्मक रचना का यह प्रयास सफल रहा।हरिशंकर परसाई जी की रचनाओं की याद ताजा हो गई।✍️👏👏👍☺️🙏🙏
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Sandhya Bakshi
हृदयविदारक कथा ! ... बुद्धिजीवियों पर करारा कटाक्ष ! पढ़ कर मन द्रवित हो गया । शब्दशिल्प व भाषाशैली की जितनी प्रशंसा करें ,कम ही लगेगी । सार्थक ,स्पष्ट, सृजन हेतु बधाई ,आपको ।
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Nittu kumar
यही विडम्बना है🤔🤔🤔🤔🤔🤔 व्यवस्था और तथाकथित बुद्धिजिबियों पर सराहनीय व्यंग👌👌👌👌👌👌💐💐💐💐
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Aditi Tandon
सच लिखा है आपने कई बार ऐसा ही होता है 👌👌👌
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Divya rani Pandey
मानवीयता को झकझोर कर रख दिया यथार्थ को बतलाती👍
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