भरवां भिंडी और करेले

सुधा अरोड़ा

भरवां भिंडी और करेले
(65)
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सारांश

अकेली औरत पीछे लौटती है , बीसियों साल पहले के मौसम में जब वह अकेली नही थी , सुबह से फिरकनी की तरह घर में घूमने लगती थी , इसके लिए जूस , उसके लिए शहद नीबू , पलंग पर पड़ी बीमार सास तिपाई पर रखी उसकी ...
Seema Rani
बहुत कमाल की कविता
aakriti
bhut bhut bhut sunder
neetu singh
बहुत खूबसूरती से स्त्री की व्यथाओं को समेटा है आपने शब्दो मे.
Ravindra Narayan Pahalwan
वाह / क्या बात है / पाठक पर पकड़ मजबूत है / बहुत खूब...
prabha malhotra
बहुत खूबसूरती से औरत की मनोदशा का चित्रण और वो भी सब्जियों के माध्यम से, साधुवाद, सरल शब्द परन्तु गंभीर अर्थ
Om Shankar
सच करैला ही नहीं है कुछ स्वाद के चुनाव का भी दोष है ।
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