बेतरतीब कतरनें

रजनी गुप्‍त

बेतरतीब कतरनें
(37)
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सारांश

'दीदी , सुगंधा दीदी की पक्‍की दोस्‍त , कैसी हैं आप ? सुगंधा दीदी के मुंह से तो अक्‍सर आपका नाम सुनते रहते । ‘ 'अरे , मुन्‍नी, तू यहां कैसे ? और कैसी है सुगंधा ? कितने सालों से उसे देखा तक नही । ...
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