बेटी

Kiran Singh

बेटी
(74)
पाठक संख्या − 749
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सारांश

ससुराल चली गयी बेटी की याद
Ruchi Gopal
अच्छी रचना है आपकी।मा पाप की याद दिला दी आपने
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brajmohan pandey
किरण जी बेटी ससुराल नयी दुनिया रचानेजाती है।।यदि ससुराल वालों ने आदमियत खो दी तो बेटी भीड मे भी अकेली रह जाती है।आज मां बाप इसी से च़ितित रहते है।आदमियत पर मेरी रचना आदमी पढने का कष्ट करें।रचना सुन्दर है।प्रयास जारी रखें।
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मीरा परिहार
भावुक कर देने वाली रचना है आपकी
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Sarita Chaturvedi
बहुत सुन्दर रचना ।किरनें जी मैने अभी कोई रचना नहीं लिखी है ।
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अंशु शर्मा
बहुत खूबसूरत लिखा
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Dharm Pal Singh Rawat
बेटी तो धान की पौध की तरह है उगती कही है और फलती फूलती कहीं है।
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Sudhir Kumar Sharma
अद्भुत
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Priyanka Sharma
आदरणीय किरण जी, आपकी इस कविता में जैसे किसी के ह्रदय का दर्द छुपा हुआ है। बेटी के दूर जाने की कमी जितनी माँ को खलती है उसकी बराबरी करना मुश्किल है. मैं शब्दनगरी पर भी लिखती हूँ, आपको बताना चाहती हूँ की आप वहाँ पर भी अपने लेख प्रस्तुत करें, बहुत से पाठक वहाँ भी आपकी रचना को पढ़कर आनंदित होंगे, इसी आशा से आपसे ये निवेदन कर रही हूँ. यदि मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझे प्रतिउत्तर में अवश्य बताएं। शब्दनगरी पर अकाउंट बनाने के लिए लिंक shabd.in लिख के अकाउंट बनाए और अपना लेख ज़रूर प्रकाशित करें।
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aparna
सुन्दर भाव
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