*बेटा या बेटी* (लघुकथा)

Neelofar Neelu

*बेटा या बेटी* (लघुकथा)
(107)
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सारांश

आज फ़िर से नीलिमा का पूरा बदन किसी फ़ोड़े की भांति ही दुःख रहा था। जबसे वह जोधपुर से आयी थी, जाने कैसा बुख़ार आ रहा था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। घर में पति और तीन तीन बेटों के होते हुए भी एक ...
Sandhya Bhadoria
बेटियों के प्यार और ममता को दरशाती हुई सुदर कहानी
मिश्रा प्रिया
बेहतरीन काश इसे हमारा समाज समझ सकता
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Archana Varshney
बहुत अच्छी
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Neha Sharma
बेटियों के बिना तो घर खाली होता हैं। बड़े भाग्यशाली होते हैं वह परिवार जिनके घर बेटियां जन्म लेती है। सुंदर रचना के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
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Priyashi Sourav
beti hi hr dard ko sh leti syd isliye to mayeje ki khatir sb has k sh leti ,nice story
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pooja
very good story 👌
Shourabh Prabhat
बहुत बढिया
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